इन्साफ का दर है तेरा ... | Bhajan - 49 | Shri Prabhu/Baba Bhajan | Insaaf Ka Dar Hai Tera ...
(तर्ज- होठों से छूलों तुम )
इन्साफ का दर है तेरा, यही सोच के आता हूँ,
हर बार तेरे दर से, खाली ही जाता हूँ॥ टेर
॥
आवाज लगाता हूँ, क्यूँ जवाब नहीं मिलता,
दानी हो सबसे बड़े, मुझको तो नहीं लगता।
शायद किस्मत में नहीं, दिल को समझाता हूँ॥ इन्साफ का दर... ॥
जजबात दिलों के प्रभु, धीरे से सुनाता हूँ,
देख ना कहीं कोई, हालात छुपाता हूँ।
सब हंसते हैं मुझपे, मैं ऑसू बहाता हूँ ॥ इन्साफ का दर... ॥
दीनों को सताने का, अन्दाज पुराना है,
देरी से पाने का, बस एक बहाना है ।
खाली जाने से प्रभु, दिल में शर्माता हूँ ॥ इन्साफ का दर... ॥
हैरां हूँ प्रभु तुमने, दुखियो को लौटाया है,
फिर किसके लिए तुमने, दरबार लगाया है।
'बनवारी' महिमा तेरी, कुछ समझ न पाता हूँ ॥ इन्साफ का दर... ॥
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