भजमन राम चरण सुखदाई, भजमन राम चरण सुखदाई॥ Bhajan 134 | Bhajman Ram Charan Sukhdai ...
भजमन राम चरण सुखदाई, भजमन राम चरण सुखदाई॥
जिहि चरनन से निकसी सुरसरि, संकर जटा समाई।
जटासंकरी नाम परयो है, त्रिभुवन तारन आई॥
॥ भजमन राम चरण सुखदाई...॥
जिन चरननकी चरनपादुका, भरत रह्यो लव लाई।
सोइ चरन केवट धोइ लीने, तब हरि नाव चलाई॥
॥ भजमन राम चरण सुखदाई...॥
सोइ चरन संत जन सेवत, सदा रहत सुखदाई।
सोइ चरन गौतमऋषि-नारी परसि परमपद पाई॥
॥ भजमन राम चरण सुखदाई...॥
दंडकबन प्रभु पावन कीन्हो, ऋषियन त्रास मिटाई।
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी कनक मृगा सँग धाई॥
॥ भजमन राम चरण सुखदाई...॥
कपि सुग्रीव बंधु भय-ब्याकुल, तिन जय छत्र फिराई।
रिपु को अनुज बिभीषन निसिचर परसत लंका पाई॥
॥ भजमन राम चरण सुखदाई...॥
सिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक, सेष सहस मुख गाई।
तुलसीदास मारुत-सुतकी प्रभु निज मुख करत बड़ाई॥
॥ भजमन राम चरण सुखदाई...॥
भजमन राम चरण सुखदाई, भजमन राम चरण सुखदाई॥
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