Chirmi Shiva Bhole Nath Ji | चिरमी शिव भोले नाथ जी | Bhajan 172 |

 

(तर्ज ; चिरमी )


शिव कैलाशी, का है वासी, नित भाँग धतूरा खाय

शिव भोले नाथ जी ||

माथे पे तो चंदा सोहे, और जटा में-र गंग समाय

शिव भोले नाथ जी ||

गल सर्पों की माला लिपटे, कैसा अदूभुत-२ रूप दिखाय

शिव भोले नाथ जी ||

ओडढ़े मृगछाला तो भोले, लेई त्रिशुल-२ हाथ उठाय

'शिव भोले नाथ जी ||

नन्दी की तो करे सवारी, और अंग-२ भभूति रमाय ़

शिव भोले नाथ जी ||

तप कैलाश पे करते भोले, जाने किसका-२ ध्यान लगाये कर

शिव भोले नाथ जी ||

करते ताण्डव, नृत्य भोले, और डमरू-२ रहे बजाये

शिव भोले नाथ जी ||

शिव भोले है औघड़दानी, दें दे जो भी मन मे आये

शिव भोले नाथ जी ||

दास  “रवि" भी करता विनती, हमें देना-२ दरश दिखाय

शिव भोले नाथ जी ||

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